ब्रह्म क्या है ? या ब्रह्म कौन है?
यदि हम पुराणो अनुसार देखें या उन शास्त्रों के अनुसार देखें जिसमें ईश्वर के स्वरुप का विस्तृत विवरण है तो :
ब्रह्म, विष्णु ,भागवत, गरुड़, ब्रह्मवैवर्त , वामन, मत्स्य, वराह, पद्म, नरसिंह, कूर्म आदि पुराण एवं वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, महाभारत गीता आदि शास्त्रों में भगवान विष्णु एवं उनके अवतार ही ब्रह्म है और उन्ही से समस्त जगत और देवी देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ।
शिव,लिंग, स्कंद, वायु, कूर्म आदि पुराण में भगवान शम्भु शिव शंकर ब्रह्म हैं और उनसे समस्त जगत एवं देवी देवता उत्पन्न हुए ।
देवी भागवत मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती कालिका आदि पुराण में आदि शक्ति ब्रह्म स्वरूपिणी हैं और उनसे समस्त जगत एवं देवी देवताओं का प्राकट्य हुआ ।
सौर भविष्य आदि पुरानी में आदित्य रूपी सूर्य भगवान् ब्रह्म हैं ।
गणेश पुराण मुद्गल पुराण गणपति अथर्वशीर्ष उपनिषद आदि शास्त्रों में गणेश भगवान ब्रह्म स्वरूप हैं एवं उनसे समस्त जगत की उत्पत्ति हुई।
अत: सभी शास्त्रों का विश्लेषण करने पर गणेश, सूर्य, दुर्गा, विष्णु(अवतार सहित) एवं महादेव ही ब्रह्म स्वरूप हैं एवं हिंदू धर्म के लोग इन्हें ही अपना इष्ट मानते हैं |
इन्ही देवों के प्राय: मंदिर आपको देखने को मिलेंगे या ये कहिये इनके भक्त इन्हें ब्रह्म मानकर ही उपासना करते हैं|
ये पञ्च देव अर्थात दुर्गा माँ, विष्णु भगवन , शिवजी गणेश जी आदि पूज्य हैं क्योंकि ये सब 'ब्रह्म' हैं या ब्रह्म मूर्त रूप में इन्ही पांच रूपों में प्रमुख रूप से विभक्त हैं|
ये ब्रह्म ना बताए गए होते इनके समर्पित पुराणो में या यदि ये ब्रह्म न होते निश्चय ही ये परमात्मा एवं उपास्य योग्य भी न होते । क्योंकि हिन्दू धर्म सभी प्रकार से उस ब्रह्म की ही उपासना करता है |
कुछ धूर्त ढोंगी पाखंडी लोग जैसे रामपाल और कुछ अन्य हिंदू मत के ही नक़ली शैव पंथी , और नक़ली वैष्णव पंथी लोग किसी एक पुराण को पकड़कर जिसमें कोई देव ब्रह्म बताया गया है उसे छोरकर अन्य सभी देवताओं की स्थिति दिखाकर लोगों को भ्रमित करते हैं ।
जैसे कपटी ढोंगी रामपाल देवी पुराण से त्रिदेवों की स्थिति निम्न बताकर उन्हें उनकी शक्तियों को कम बताकर भोले भाले हिंदुओ को बरगलाता है ।
अब स्वाभाविक बात है देवी पुराण में देवी ही ब्रह्म स्वरूपा बताई गयीं हैं तो उनसे ही सबकी उत्पत्ति और उनकी ही सबके द्वारा स्तुति बताई जाएगी उपरोक्त पुराण में ।
ऐसे पाखंडीयों से यही प्रसंग भागवत गरुड़ आदि पुराण से दिखाने कहो तो बगुले झांकते फिरते हैं या फिर उन पुराणो को अमान्य करार दे देते हैं ।
इसी प्रकार कुछ नक़ली ढोंगी फ़र्ज़ी दुकानदार नक़ली शैव पंथी लोग शिव आदि पुराण का हवाला देकर शिवजी को ऊँचा और नारायण का तिरस्कार करते हैं । और उन्हें यदि वैष्णव आदि पुराण का प्रमाण दो तो उसे अमान्य करार दे देते हैं । हालाँकि वास्तविक तंत्र शिव उपासक ऐसी कपट पूर्ण हरकत से परहेज़ करते हैं ।
इसी प्रकार कुछ तथाकथित वैष्णव सम्प्रदाय के जन भगवान नारायण को समर्पित पुराणो का प्रमाण दिखाकर भगवान शिव, देवी, गणपति आदि को निम्न सिद्ध करने का प्रयास करते हैं क्योंकि वैष्णव आदि पुराण में भगवान विष्णु को ब्रह्म एवं उनसे सभी जगत एवं देवता आदि की उत्पत्ति बतलाई है । महाभारत शास्त्र में जोकि सभी पुराणों से पहले लिखा गया है और भगवद गीता जिसका एक भाग है उसमे विष्णु से समस्त जगत एवं देवताओ प्राणियों की उत्पत्ति होना बताया है |
किन्तु ये लोग भी मात्र विष्णु भगवान को समर्पित शास्त्र एवं पुराणों को बस स्वीकार्य करते हैं और अन्य पुराण जैसे शिव पुराण आदि को अस्वीकार्य |
इस प्रकर के श्रेणी के लोग मूर्ख या धूर्त ही होते हैं क्योंकि सभी १८ पुराण एवं अन्य स्मृति इतिहास आदि शास्त्रों का निष्पक्ष दृष्टिकोण से अध्ययन करने में पता चलता है की ब्रह्म का मूर्त स्वरुप इन पञ्चदेवों के रूप में ही है ।
अब प्रश्न यह आता है क्या ब्रह्म इतने सारे हैं ? परमात्मा इतने सारे हैं क्योंकि श्रुति तो कहती हैं एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति अर्थात् ब्रह्म एक ही है दूसरा नहीं । तो इतने सारे कैसे ?
तो इसका निराकरण ही वेद करते हैं जैसे ऋग्वेद १/१६४/४६ में लिखा है कि एकं सत विप्र बहुधा वदंति अर्थात् एक ही सत्य को मुनिगण अनेक तरह से वर्णित करेंगे तो एक मंत्र यह भी आता है ऋग्वेद १०/११४/५ में :
सुपर्ण विप्रा कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति
अर्थात् उस गुण युक्त परमेश्वर की बुद्धिमान एवं सन्त अनेक प्रकार से कल्पित करके बताएँगे ।
और पुराण आदि शास्त्र में यही देखने को मिलता है जिसमें प्रायः दो या अनेक ऋषिओं का संवाद रहता है और वो ब्रह्म का विविध तरीक़े से विवरण देते हैं।
नारद प्रह्लाद ध्रुव हनुमान जी अन्य सभी विष्णु आदि भक्तों ने भगवान नारायण को ब्रह्म मानकर ही उनकी स्तुति की है ।
अतः कोई तथाकथित ज्ञानी आपसे ये कहे देवी देवताओं की पूजा मत करो ब्रह्म की करो हम ब्रह्मज्ञान देंगे आदि तो उनके लिए गोसाईं तुलसीदास जी के मानस से यह दोहा पर्याप्त है :
व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुण विगत विनोद। सो अज प्रेम भक्ति वश कौसल्या के गोद : बालकांड दोहा क्रमांक १९८
अर्थात् वह व्यापक ब्रह्म निर्गुण निरंजन ही कौसल्या माई के गोद में राम रूप में विनोद कर रहे हैं ।
अतः हिंदू अपने इष्ट राम कृष्ण शिव आदि को ब्रह्म रूपा मानकर ही भजते हैं अन्य साधारण देवी देवता नहीं ।
जय श्रीराम।।।