Friday, 24 April 2026

श्रीभगवान की पवित्रता

जिनके स्पर्श मात्र से पाषाण मूर्ति अहिल्या जीवंत हो गईं ।

जिनका उल्टे नाम जपने मात्र से रत्नाकर जैसे ख़ूँख़ार डकैत भी आदिकवि वाल्मीकि बन गए ।

जिनके कृपा मात्र से गयासुर नामक असुर का मृत शरीर भी गया तीर्थ क्षेत्र में पितरों को तारने योग्य हो गया।

जिनके नाम (राम) का मन्त्र देकर स्वयं विश्वेश्वर शंभु महादेव काशी में प्राणियो को मुक्ति प्रदान करते हैं ।

जिसके नाम के प्राप्त होने से ही एक योद्धा बर्बरीक खाटू श्याम बनकर स्वयं भगवान जितने  पूज्य हो  गए।

जिनके नाम लिखने मात्र से विशाल महासागर में पत्थर भी तैरने लग गए ।

जिनसे मृत्यु प्राप्त करके पूतना, केशी , तृणावर्त, कालियानाग आदि जैसे विभत्स असुर भी मुक्तिभाव को प्राप्त कर गए।

जिनके चरणों को धोकर गंगा विष्णुपादोदकी कहलाई और पापनाशिनी एवं  परम पवित्र हो गईं। 

वे श्रीभगवान स्वयं कितने ही पवित्र होंगे ? सोचो तो ज़रा




Saturday, 9 October 2021

ब्रह्म निरूपण


ब्रह्म क्या है ? या ब्रह्म कौन है? 

यदि हम पुराणो अनुसार देखें या उन शास्त्रों के अनुसार देखें जिसमें ईश्वर के स्वरुप का विस्तृत विवरण है तो : 

ब्रह्म, विष्णु ,भागवत, गरुड़, ब्रह्मवैवर्त , वामन, मत्स्य, वराह, पद्म, नरसिंह,  कूर्म आदि पुराण एवं वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, महाभारत गीता  आदि शास्त्रों में भगवान विष्णु एवं उनके अवतार ही ब्रह्म है और उन्ही से समस्त जगत और देवी देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ। 


शिव,लिंग, स्कंद, वायु, कूर्म आदि पुराण में भगवान शम्भु शिव शंकर ब्रह्म हैं और उनसे समस्त जगत एवं देवी देवता उत्पन्न हुए ।


देवी भागवत मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती कालिका आदि पुराण में आदि शक्ति ब्रह्म स्वरूपिणी हैं और उनसे समस्त जगत एवं देवी देवताओं का प्राकट्य हुआ  ।


सौर भविष्य आदि पुरानी में आदित्य रूपी सूर्य भगवान् ब्रह्म हैं । 


गणेश पुराण मुद्गल पुराण गणपति अथर्वशीर्ष उपनिषद आदि शास्त्रों में गणेश भगवान ब्रह्म स्वरूप हैं एवं उनसे समस्त जगत की उत्पत्ति हुई। 


अत: सभी शास्त्रों का विश्लेषण करने पर गणेश, सूर्य, दुर्गा, विष्णु(अवतार सहित) एवं महादेव ही ब्रह्म स्वरूप हैं एवं हिंदू धर्म के लोग इन्हें ही अपना इष्ट मानते हैं 

इन्ही देवों के प्राय: मंदिर आपको देखने को मिलेंगे या ये कहिये इनके भक्त इन्हें ब्रह्म मानकर ही उपासना करते हैं|

ये पञ्च देव अर्थात दुर्गा माँ, विष्णु भगवन , शिवजी गणेश जी आदि  पूज्य हैं क्योंकि ये सब 'ब्रह्म' हैं या ब्रह्म मूर्त रूप में इन्ही पांच रूपों में प्रमुख रूप से विभक्त हैं|

 ये ब्रह्म ना बताए गए होते इनके समर्पित पुराणो में या यदि ये ब्रह्म न होते  निश्चय ही ये परमात्मा एवं उपास्य योग्य भी  न  होते । क्योंकि हिन्दू धर्म सभी प्रकार से उस ब्रह्म की ही उपासना करता है | 


कुछ धूर्त ढोंगी पाखंडी लोग जैसे रामपाल और कुछ अन्य हिंदू मत के ही नक़ली शैव पंथी , और नक़ली वैष्णव पंथी लोग किसी एक पुराण को पकड़कर जिसमें कोई देव ब्रह्म बताया गया है उसे छोरकर अन्य सभी देवताओं की स्थिति दिखाकर लोगों को भ्रमित करते हैं ।


जैसे कपटी ढोंगी रामपाल देवी पुराण से त्रिदेवों की स्थिति निम्न बताकर उन्हें उनकी शक्तियों को कम बताकर भोले भाले हिंदुओ को बरगलाता है ।

अब स्वाभाविक बात है देवी पुराण में देवी ही  ब्रह्म स्वरूपा बताई गयीं हैं तो उनसे ही सबकी उत्पत्ति और उनकी ही सबके द्वारा स्तुति बताई जाएगी उपरोक्त पुराण में  । 

ऐसे पाखंडीयों से यही प्रसंग भागवत गरुड़ आदि पुराण से दिखाने कहो तो बगुले झांकते फिरते हैं या फिर उन पुराणो को अमान्य करार दे देते हैं ।

इसी प्रकार कुछ नक़ली ढोंगी फ़र्ज़ी दुकानदार नक़ली शैव पंथी  लोग शिव आदि पुराण का हवाला देकर शिवजी को ऊँचा और नारायण का तिरस्कार करते हैं । और उन्हें यदि वैष्णव आदि पुराण का प्रमाण दो तो उसे अमान्य करार दे देते हैं ।  हालाँकि वास्तविक तंत्र शिव उपासक ऐसी कपट पूर्ण हरकत से परहेज़ करते हैं ।


इसी प्रकार कुछ तथाकथित वैष्णव सम्प्रदाय के जन भगवान नारायण को समर्पित पुराणो का प्रमाण दिखाकर भगवान शिव, देवी, गणपति आदि को निम्न सिद्ध करने का प्रयास करते हैं क्योंकि वैष्णव आदि पुराण में भगवान विष्णु को ब्रह्म एवं उनसे सभी जगत एवं देवता आदि की  उत्पत्ति बतलाई है । महाभारत शास्त्र में जोकि सभी पुराणों से पहले लिखा गया है और भगवद गीता जिसका एक भाग है उसमे विष्णु से समस्त जगत एवं देवताओ प्राणियों की उत्पत्ति होना बताया है |

किन्तु ये लोग भी मात्र विष्णु भगवान को समर्पित शास्त्र एवं पुराणों को बस स्वीकार्य करते हैं और अन्य पुराण जैसे शिव पुराण आदि को अस्वीकार्य |

इस प्रकर के श्रेणी के लोग मूर्ख या धूर्त ही होते हैं क्योंकि सभी १८ पुराण एवं अन्य स्मृति इतिहास आदि शास्त्रों का निष्पक्ष दृष्टिकोण से अध्ययन करने में पता चलता है की ब्रह्म का मूर्त स्वरुप इन पञ्चदेवों के रूप में ही है ।

अब प्रश्न यह आता है क्या ब्रह्म इतने सारे हैं ? परमात्मा इतने सारे हैं क्योंकि श्रुति तो कहती हैं एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति अर्थात् ब्रह्म एक ही है दूसरा नहीं । तो इतने सारे कैसे ?

तो इसका निराकरण ही वेद करते हैं जैसे ऋग्वेद १/१६४/४६ में लिखा है कि एकं सत विप्र बहुधा वदंति अर्थात् एक ही सत्य को मुनिगण अनेक तरह से वर्णित करेंगे तो एक मंत्र यह भी आता है ऋग्वेद १०/११४/५ में :

सुपर्ण विप्रा कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति

अर्थात् उस गुण युक्त परमेश्वर की बुद्धिमान एवं सन्त अनेक प्रकार से कल्पित करके बताएँगे ।


और पुराण आदि शास्त्र में यही देखने को मिलता है जिसमें प्रायः दो या अनेक ऋषिओं का संवाद रहता है और वो ब्रह्म का  विविध तरीक़े से विवरण देते हैं।

नारद प्रह्लाद ध्रुव हनुमान जी अन्य सभी विष्णु आदि भक्तों ने भगवान नारायण को ब्रह्म मानकर ही उनकी स्तुति की है ।

अतः कोई तथाकथित ज्ञानी आपसे ये कहे देवी देवताओं की पूजा मत करो ब्रह्म की करो हम ब्रह्मज्ञान देंगे आदि तो उनके लिए गोसाईं तुलसीदास जी के मानस से यह दोहा  पर्याप्त है :


व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुण विगत विनोद। सो अज प्रेम भक्ति वश कौसल्या के गोद : बालकांड दोहा क्रमांक १९८ 

अर्थात् वह व्यापक ब्रह्म निर्गुण निरंजन ही कौसल्या माई के गोद में राम रूप में विनोद कर रहे हैं ।


अतः हिंदू अपने इष्ट राम कृष्ण शिव आदि को ब्रह्म रूपा मानकर ही भजते हैं अन्य साधारण देवी देवता नहीं ।

जय श्रीराम।।।

Tuesday, 11 December 2018

त्रिदेवो का रहस्य एवं महत्व।।

त्रिदेव रहस्य।।

पुराणादि शास्त्रों में अधिकांश लोगों को यह सुनने में आता है त्रिदेवों की कथाएँ और त्रिदेवों से भी अन्य कोई है।

यह सदैव एक रहस्य लोगो के मन मे आता है कि त्रिदेवों से अन्य या अतिरिक्त कौन क्योंकि सभी पुराणों में विभिन्न त्रिदेव और उनके उतपत्ति कारण बतलायें जाते हैं।

किन्तु क्या आपने सोचा है यदि त्रिदेवों से परे भी कोई है तो कौन है और उसकी जानकारी कहाँ से प्राप्त होगी?

सम्भवतः इसकी जानकारी भी उन्ही पुराणों में मिलेगी जिनमे त्रिदेवों से भिन्न किसी को बतलाया गया तो आइए जानते हैं किसे बतलाया है।

विष्णुपुराण, वामन पुराण  के अनुसार त्रिदेवों के उतपत्ति कारक विराट पुरुष नारायण है जिनके सहस्त्र शीर्ष हाथ इत्यादि है जोकि गीताजी के अध्याय ११ के नायक हैं और वो त्रिदेवों में विष्णु से परे नही साक्षात वही हैं।

शिव एवं वायु पुराण के अनुसार त्रिदेवों के अतिरिक्त सदाशिव हैं जिनके ५ मुख हैं और उनमें और त्रिदेवों के शंकर में कोई भिन्नता नहीं इस स्पष्ट कहा है उन सदाशिव ने त्रिदेवों में रुद्र साक्षात मैं ही हूँ।

ब्रह्मवैवर्त, भागवत , ब्रह्मांड पुराण के अनुसार त्रिदेव के कारण श्रीकृष्ण हैं।

भगवान आद्य शंकर की प्रबोधसुधाकर में भी शंकराचार्य जी ने श्रीकृष्ण को त्रिदेवों से अतिरिक्त एक सच्चिदानंदमयी नीलिमा कहा।

देवीभागवत में त्रिदेवो के कारण भगवती देवी और कृष्णजी भी हैं अध्याय ९ के अनुसार।

कुल मिलाकर देखा जाए तो त्रिदेवों के ऊपर जो हैं पुराणों अनुसार वह है:

विष्णुपुराण->नारायण(जोकि त्रिदेव के विष्णु से भिन्न नहीं)
वायु एवं शिवपुराण-> सदाशिव (जोकि त्रिदेव के रुद्र से भिन्न नहीं)
ब्रह्मवैवर्त, भागवत , ब्रह्मांड-> कृष्ण(जोकि त्रिदेव के विष्णु से भिन्न नहीं)
देवीभागवत-> देवी, कृष्ण( जिसमें देवी को शिवा और कृष्ण नारायण ही हैं)

अर्थात: त्रिदेव से भी ऊपर : त्रिदेव या विष्णु, या नारायण या शिव या देवी या कृष्ण।

कोई दूसरा है त्रिदेव के अलावा ?
नही।

इसलिए गीताजी के अध्याय १३ के श्लोक १६ में स्पष्ट है:

वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होताहै।
 वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है।।

अतः त्रिदेव ही परमात्मा हैं परमात्मा ही त्रिदेव।
त्रिदेव से ऊपर भी यही त्रिदेव ही हैं।

सनातन धर्म का आधार ही हैं त्रिदेव
सनातन का आरंभ भी त्रिदेव और अंत भी त्रिदेव।।
इनके अतिरिक्त भी कोई और नहीं ये ही हैं।।।

त्रिदेव ही वेदों का : एक सत विप्र बहुधा वदन्ति मन्त्र को सिद्ध करते हैं

सब उनकी लीलामात्र है।

जय श्रीराम।।।

Saturday, 22 April 2017

सनातन धर्म का एक संक्षिप्त परिचय।



सनातन में अन्य मज़हबों  से यही भिन्नता है कि सनातन अपने आप मे सबसे बड़ा अपने आप मे या सभी मज़हबों में लोकतांत्रिक(democratic) धर्म है अर्थात अनेक विभिन्न ईश्वर स्वरूप एवम पूजा पद्धति। सनातन मनुष्य पर छोड़ता है पूर्ण स्वतंत्रता देता है उसे किस अवतार या स्वरूप या किस ग्रन्थ को पकड़कर आगे बढ़ना है बस भाव शुद्ध हों।

कोई एक नही अपितु 1300 से अधिक ग्रन्थ और सब अपने अपने जगह सही आपके ऊपर सनातन धर्म निर्णय छोड़ता है कि आपको किस ग्रन्थ या किस ईश्वर के स्वरूप को पूजना है। बस मूल इतना हो आपके भाव सही और कर्म अच्छे हों क्योंकि सनातन पूजा पद्धति में भाव एवं कर्म ही मायने रखते हैं ईश्वर स्वरूप कदापि नहीं। भाव भक्तिमय और कर्म पुण्यमय हो तो आप किसी को न भी पूजें तो भी सनातन अनुसार एक पुण्यात्मा कहलायेंगे।

 रही बात सनातन के अनेक विभिन्न मतों संप्रदायों की जैसे रामानुज सम्प्रदाय , शंकराचार्य जी का शांकर सम्प्रदाय  , माधवाचार्य, इत्यादि सन्तों और अन्य विभिन्न मतों की मान्यताओं  की तो ऋग्वेद ने  स्वयं कह गया : "एकं सत विप्र बहुध वदन्ति" अर्थात : वो सत्य(ईश्वर) एक ही है किन्तु अलग अलग ऋषि संत उसे अलग अलग नाम (स्वरूपों) से बतलाएंगे।

यही सनातन का मूल एवम गूढ़ है जो तर्क बुद्धि नही अपितु आध्यात्मिक चिंतन और स्वाध्याय से समझ आता है।

जय श्रीराम।।

श्रीभगवान की पवित्रता

जिनके स्पर्श मात्र से पाषाण मूर्ति अहिल्या जीवंत हो गईं । जिनका उल्टे नाम जपने मात्र से रत्नाकर जैसे ख़ूँख़ार डकैत भी आदिकवि वाल्मीकि बन गए ...