सनातन में अन्य मज़हबों से यही भिन्नता है कि सनातन अपने आप मे सबसे बड़ा अपने आप मे या सभी मज़हबों में लोकतांत्रिक(democratic) धर्म है अर्थात अनेक विभिन्न ईश्वर स्वरूप एवम पूजा पद्धति। सनातन मनुष्य पर छोड़ता है पूर्ण स्वतंत्रता देता है उसे किस अवतार या स्वरूप या किस ग्रन्थ को पकड़कर आगे बढ़ना है बस भाव शुद्ध हों।
कोई एक नही अपितु 1300 से अधिक ग्रन्थ और सब अपने अपने जगह सही आपके ऊपर सनातन धर्म निर्णय छोड़ता है कि आपको किस ग्रन्थ या किस ईश्वर के स्वरूप को पूजना है। बस मूल इतना हो आपके भाव सही और कर्म अच्छे हों क्योंकि सनातन पूजा पद्धति में भाव एवं कर्म ही मायने रखते हैं ईश्वर स्वरूप कदापि नहीं। भाव भक्तिमय और कर्म पुण्यमय हो तो आप किसी को न भी पूजें तो भी सनातन अनुसार एक पुण्यात्मा कहलायेंगे।
रही बात सनातन के अनेक विभिन्न मतों संप्रदायों की जैसे रामानुज सम्प्रदाय , शंकराचार्य जी का शांकर सम्प्रदाय , माधवाचार्य, इत्यादि सन्तों और अन्य विभिन्न मतों की मान्यताओं की तो ऋग्वेद ने स्वयं कह गया : "एकं सत विप्र बहुध वदन्ति" अर्थात : वो सत्य(ईश्वर) एक ही है किन्तु अलग अलग ऋषि संत उसे अलग अलग नाम (स्वरूपों) से बतलाएंगे।
यही सनातन का मूल एवम गूढ़ है जो तर्क बुद्धि नही अपितु आध्यात्मिक चिंतन और स्वाध्याय से समझ आता है।
जय श्रीराम।।